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नरसिंह मंदिर जोशीमठ उत्तराखंड

नरसिंह मंदिर उत्तराखंड के चमोली जिला के जोशीमठ में स्थित एक हिंदू धार्मिक स्थल हैं।नरसिंह का यह मंदिर भगवान विष्णु के चौथे अवतार भगवान नरसिंह को समर्पित हैं। इस मंदिर को जोशीमठ के प्रमुख मंदिर के रूप में जाना जाता है।नरसिंह मंदिर को नरसिंह बद्री के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर में स्थित नरसिंह भगवान पौराणिक कथा के अनुसार अपने प्रिय भक्त प्रहलाद की रक्षा के लिए राक्षस हिरणकश्यप के संघार करने के लिए अवतार लिए थे। इस नरसिंह मंदिर को भगवान के 108 दश्मो में से एक माना जाता है।

जोशीमठ या ज्योतिर्मठ का इतिहास :-

                   जोशीमठ या ज्योतिर्मठ भारत के उत्तराखण्ड राज्य के चमोली ज़िले में स्थित एक नगर है जहाँ हिन्दुओं की प्रसिद्ध ज्योतिष पीठ स्थित है। यहाँ ८वीं सदी में धर्मसुधारक आदि शंकराचार्य को ज्ञान प्राप्त हुआ और बद्रीनाथ मंदिर तथा देश के विभिन्न कोनों में तीन और मठों की स्थापना से पहले यहीं उन्होंने प्रथम मठ की स्थापना की। जाड़े के समय इस शहर में बद्रीनाथ की गद्दी विराजित होती है जहां नरसिंह के सुंदर एवं पुराने मंदिर में इसकी पूजा की जाती है। पांडुकेश्वर में पाये गये कत्यूरी राजा ललितशूर के तांब्रपत्र के अनुसार जोशीमठ कत्यूरी राजाओं की राजधानी थी, जिसका उस समय का नाम कार्तिकेयपुर था। लगता है कि एक क्षत्रिय सेनापति कंटुरा वासुदेव ने गढ़वाल की उत्तरी सीमा पर अपना शासन स्थापित किया तथा जोशीमठ में अपनी राजधानी बसायी। वासुदेव कत्यूरी ही कत्यूरी वंश का संस्थापक था। जिसने 7वीं से 11वीं सदी के बीच कुमाऊं एवं गढ़वाल पर शासन किया।
                                  फिर भी हिंदुओं के लिये एक धार्मिक स्थल की प्रधानता के रूप में जोशीमठ, आदि शंकराचार्य की संबद्धता के कारण मान्य हुआ। जोशीमठ शब्द ज्योतिर्मठ शब्द का अपभ्रंश रूप है जिसे कभी-कभी ज्योतिषपीठ भी कहते हैं। इसे वर्तमान ईसा पुर्व ५१५ में आदि शंकराचार्य ने स्थापित किया था। यहीं उन्होंने शंकर भाष्य की रचना की जो सनातन धर्म के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है।

भगवान बद्री विशाल की शीतकालीन गद्दी :-

जाड़े के 6 महीनों के दौरान जब बद्रीनाथ मंदिर बर्फ से ढंका होता है तब भगवान विष्णु की पूजा बद्री विशाल के कपाट बंद होने के पश्चात जोशीमठ के नरसिंह मंदिर में ही होती है।।

 


 

भविष्य में हो जाएगा बद्रीनाथ का मार्ग अवरूध :-

इस मंदिर में स्थापित प्रसिद्ध नरसिंह जी की मूर्ति की बाएं हाथ दिन प्रतिदिन घिसकर पतली होती जा रही हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर में स्थापित नरसिंह जी की प्रतिमा के हाथ जिस दिन टूट कर गिर जाएगी उस दिन नर एवं नारायण पर्वत जोकि जय एवं विजय पर्वत के नाम से प्रसिद्ध है, आपस में टकरा जाएंगे और इन पर्वत के आपस में टकराने के उपरांत बद्रीनाथ का मार्ग सदा के लिए बंद हो जाएगा। तब भगवान विष्णु जी की पूजा भविष्य बद्री में होगी। जो जोशीमठ से 20 किमी तपोवन से आगे है जहाँ एक शिला पर स्वयं विष्णु भगवान की प्रतिमा धीरे धीरे अवतरित हो रही है..।

भारत -चीन युद्ध से पहले जोशीमठ और तिब्बत का था व्यापारिक सम्बंध:-

जोशीमठ एक परंपरागत व्यापारिक शहर है और जब तिब्बत के साथ व्यापार चरमोत्कर्ष पर था तब तिब्बत के साथ यहाँ के लोगों के व्यापारिक सम्बंध थे वे आवश्यक व अन्य सामग्री खरीदकर तिब्बत वापस जाते थे। वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद यह व्यापारिक कार्य बंद हो गया .

जोशीमठ व आस-पास के अन्य दर्शनीय स्थल:-

  1. शंकराचार्य गद्दी स्थल

  2. औली व गोरसो बुग्याल- १५ किमी की दूरी पर

  3. जोगीधारा जल प्रपात -३ किमी की दूरी पर

  4. विष्णुप्रयाग- ६ किमी की दूरी पर

  5. तप्त कुंड तपोवन- १५ किमी की दूरी पर

 

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